Armaan Khan
Saturday, October 16, 2010
Thursday, October 14, 2010
क्या तुमने कभी गौर किया है...
by Armaan Khan on Monday, September 20, 2010 at 11:52am
घर से दफ़्तर,
दफ़्तर से घर जाते हुए,
क्या तुमने अपनी कार के शीशे से,
कभी आस पास गौर से देखा है....
इन्ही सड़को पर,
जो रोज़ तुमसे टकराते थे,
जिनसे तुम्हारी आँखें,
रोज़ दो चार होती थी,
इन सड़को ने उनमे से,
कुछ खुशदिल चेहरे,
कुछ चमकती हुई आँखें,
कुछ हंसते हुए आदमी,
चुपचाप कम कर दिए....
और तुम..
अपनी कार के म्यूज़िक प्लेयर से,
नयी फिल्म के गाने सुनने मे,
इतना मसरूफ़ थे,
कि तुम्हे पता भी नही चला !
- अरमान
या खुदा, पहाड़ो से क्या अज़ाब हो गया ?
by Armaan Khan on Wednesday, September 22, 2010 at 5:27pm
आसमाँ यूँ रोया कि दरिया सैलाब हो गया,
या खुदा, इन पहाड़ो से क्या अज़ाब हो गया !
मौजो ने मगरूर बांधो का गुरूर तोड़ दिया,
जा कर देखो, टिहरी में इंक़लाब हो गया !
बहुत सवाल करते थे कि मेघ दो, पानी दो,
अब क्यों परेशान हो, जब जवाब हो गया !
गाँव, खेत, जंगल, सबने गुलामी कर ली,
दरिया मे कहाँ से , इतना रुआब हो गया !
कुदरत बता रही है, तुमको तुम्हारी औकात,
इंसानो, तुम्हारे गुरूर का हिसाब हो गया !
- अरमान
ना मंदिर चाहिए, ना मस्जिद चाहिए, हमे बस हिंदोस्ताँ चाहिए !
By Armaan Khan · Tuesday, September 28, 2010
शायद खत्म ये फ़ासले हो जायेंगे,
जब हमारे बीच फ़ैसले हो जायेंगे !
अयोध्या भी सुकून से हो जायेगी,
हम तुम भी अच्छे भले हो जायेंगे !
अब बदगुमानियाँ भी मिट जाएँगी,
दूर, सब शिकवे गिले हो जायेंगे !
हाथों से नही, दिल से मिलेंगे तो,
दिल से दिल के मरहले हो जायेंगे !
नफ़रत ढूँढने से भी ना मिलेगी,
मोहब्बत के सिलसिले हो जायेंगे !
- अरमान
आज शहर की फ़िज़ा बहुत भारी है !
by Armaan Khan on Thursday, September 30, 2010 at 1:14pm
दिलों पर इक अजब सा ख़ौफ़ तारी है,
आज शहर की फ़िज़ा बहुत भारी है !
ये ना हो जाये कहीं वो ना हो जाये,
सब मे बेचैनी है , सबको बेक़रारी है !
सड़कें खाली हैं यूँ, जैसे साहूकार हैं,
लोग छुपे है, जैसे इन पर उधारी है !
संगीनो के साये, बूटों की धमक मे,
हमने देखा , ज़िंदगी बहुत बेचारी है !
नफ़रतो के ठेकेदार अब हमला बोलेंगे,
मुहब्बत वालों तुम्हारी क्या तय्यारी है !
- अरमान
आओ चलें उनसे मिलने, चाँद पर चलते हैं......
by Armaan Khan on Friday, October 8, 2010 at 3:36pm
वहीं, जहाँ पर तारे,
रोशनी के लटटूओं सा जलते हैं,
आओ चलें, अपनी उलझनो से दूर,
चाँद पर चलते हैं.....
सुना है मैने,
मुझसे बिछड़े हुए,
कई अज़ीज़ लोग,
अब वहीं पर मिलते हैं,
आओ चलें, उनसे मिलने,
चाँद पर चलते हैं......
ये भी सुना है कि,
ये सभी लोग ही,
रोज़ तारों मे ढल कर,
आसमाँ के लॉन मे टहलते हैं,
आओ चलें, उनसे मिलने,
चाँद पर चलते हैं......
आओ चलें, जल्दी करें,
कि बहुत दूर जाना है,
रात का खाना भी,
हमको वहीं पर खाना है,
देर ना हो, इसलिए,
शाम होते ही निकलते हैं,
आओ चलें, अपनो से मिलने,
चाँद पर चलते हैं......
- अरमान
छोड़ो भी, अब जाने दो.....!
by Armaan Khan on Sunday, October 10, 2010 at 11:22am
अब तुमसे,
क्या दिल का हाल कहें,
छोड़ो भी, अब जाने दो....
अपने दर्द तुम्हे दिखाएँ क्या,
तुम्हारी उलझनें और बढ़ाएँ क्या,
हमे तन्हा ही यूँ,
गमों का बोझ उठाने दो,
छोड़ो भी, अब जाने दो.....
वैसे भी, मेरी दास्तां,
एक सदी की है,
लेकिन तुम्हे फ़ुर्सत,
बस दो घड़ी की है,
अब मेरे फसाने को,
खामोशियाँ ही सजाने दो,
छोड़ो भी, अब जाने दो.....
हाथ मिलाओ, इजाज़त दो,
कि सफ़र बहुत लंबा है,
और हौसला है कि घटता जाता है,
मैं समझता तो हूँ
कि ये सफ़र तेरे बगैर,
बहुत बोझिल, बहुत भारी है,
लेकिन मैं ये भी जानता हूँ
कि तुम मंदिरों की देवी हो,
मैं रास्ते का फकत एक पत्थर हूँ,
मुझे यूँ ही इसी तरह,
रास्तों की ठोकर खाने दो,
छोड़ो भी, अब जाने दो.....
- अरमान
इक पल को तुम्हे सोचा,और घबरा से गये.....!
by Armaan Khan on Monday, October 11, 2010 at 10:12pm
हक़ीक़त की धूप मे,
आरज़ू के शज़र से,
ख्वाब के भूरे पत्ते,
जब शाखों से टूटे,
कुछ देर बहुत रोये,
आँख भर के इक नज़र,
शाखों की तरफ़ देखा,
हल्के से मुस्कुराये,
फिर मुरझा से गये.....
नींद से चौंक कर,
हम भी हड़बड़ा कर उठे,
दिल को काँपते देखा,
इक पल को तुम्हे सोचा,
और घबरा से गये.....
तब से रूह बेचैन है,
तबीयत उलझी उलझी है,
नींद कतरनो मे बदली,
बस करवट करवट गुज़री है,
इक अजब सी खामोशी,
वज़ूद के बिस्तर पर बिखरी है,
मगर ये तो बताओ कि,
उलझन तो ये सुलझनी थी,
फिर क्यूँ तुम,
और इसे उलझा से गये,
इक पल को तुम्हे सोचा,
और घबरा से गये.....
-अरमान
तब तलक तुम रुके रहना, मैं अपनी चिता पर, जब तक पूरा जल ना जाऊं...
by Armaan Khan on Wednesday, October 13, 2010 at 2:07pm
जब तक ,
राख मे ढल न जाऊं,
तब तलक तुम रुके रहना,
मैं अपनी चिता पर,
जब तक पूरा जल ना जाऊं
तब तलक तुम रुके रहना....
तुम मिल जाओ,
ज़िंदगी से यही गुज़ारिश थी,
तुम्हे पाने, तुम्हे छूने की,
एक अकेली ख्वाहिश थी,
अब तुम्हे छू कर,
खुश्बुओं मे जब तक बदल ना जाऊं,
तब तलक तुम रुके रहना,
मैं अपनी चिता पर,
जब तक पूरा जल ना जाऊं......
हाँ, तुम्हारी ही परस्तिश थी,
तुम्हारी ही इबादत थी,
तुमसे ही मेरा वुजूद था,
तुमसे ही दिल को राहत थी,
अब, जब तक जी भर के,
तुम्हे देख न लूँ,
और हवा के साथ निकल ना जाऊं,
तब तलक तुम रुके रहना,
मैं अपनी चिता पर,
जब तक पूरा जल ना जाऊं.......
हाँ, तुमने आने मे देर तो की,
मगर आये हो,
ये कम है क्या,
अब चलते चलते,
तुम्हे देख लिया,
तो हम भूल गये,
दर्द है क्या,
और गम है क्या,
अब, तेरी मुहब्बत को लिये हुए,
जब तक फ़िज़ा मे घुल ना जाऊं,
तब तलक तुम रुके रहना,
मैं अपनी चिता पर,
जब तक पूरा जल ना जाऊं......
- अरमान
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