Thursday, October 14, 2010

आज शहर की फ़िज़ा बहुत भारी है !

by Armaan Khan on Thursday, September 30, 2010 at 1:14pm


दिलों पर इक अजब सा ख़ौफ़ तारी है,
आज   शहर की  फ़िज़ा बहुत भारी है !

ये ना हो जाये  कहीं वो ना हो जाये,
सब मे बेचैनी है , सबको बेक़रारी है !

सड़कें खाली हैं यूँ,  जैसे साहूकार हैं,
लोग छुपे है,  जैसे इन पर उधारी है !

संगीनो के साये,  बूटों की धमक मे,
हमने देखा ,  ज़िंदगी बहुत बेचारी है !

नफ़रतो के ठेकेदार अब हमला बोलेंगे,
मुहब्बत वालों तुम्हारी क्या तय्यारी है !

- अरमान

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