by Armaan Khan on Thursday, September 30, 2010 at 1:14pm
दिलों पर इक अजब सा ख़ौफ़ तारी है,
आज शहर की फ़िज़ा बहुत भारी है !
ये ना हो जाये कहीं वो ना हो जाये,
सब मे बेचैनी है , सबको बेक़रारी है !
सड़कें खाली हैं यूँ, जैसे साहूकार हैं,
लोग छुपे है, जैसे इन पर उधारी है !
संगीनो के साये, बूटों की धमक मे,
हमने देखा , ज़िंदगी बहुत बेचारी है !
नफ़रतो के ठेकेदार अब हमला बोलेंगे,
मुहब्बत वालों तुम्हारी क्या तय्यारी है !
- अरमान
No comments:
Post a Comment