by Armaan Khan on Monday, October 11, 2010 at 10:12pm
हक़ीक़त की धूप मे,
आरज़ू के शज़र से,
ख्वाब के भूरे पत्ते,
जब शाखों से टूटे,
कुछ देर बहुत रोये,
आँख भर के इक नज़र,
शाखों की तरफ़ देखा,
हल्के से मुस्कुराये,
फिर मुरझा से गये.....
नींद से चौंक कर,
हम भी हड़बड़ा कर उठे,
दिल को काँपते देखा,
इक पल को तुम्हे सोचा,
और घबरा से गये.....
तब से रूह बेचैन है,
तबीयत उलझी उलझी है,
नींद कतरनो मे बदली,
बस करवट करवट गुज़री है,
इक अजब सी खामोशी,
वज़ूद के बिस्तर पर बिखरी है,
मगर ये तो बताओ कि,
उलझन तो ये सुलझनी थी,
फिर क्यूँ तुम,
और इसे उलझा से गये,
इक पल को तुम्हे सोचा,
और घबरा से गये.....
-अरमान
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