Thursday, October 14, 2010

तब तलक तुम रुके रहना, मैं अपनी चिता पर, जब तक पूरा जल ना जाऊं...

by Armaan Khan on Wednesday, October 13, 2010 at 2:07pm

जब तक ,
राख मे ढल न जाऊं,
तब तलक तुम रुके रहना,
मैं अपनी चिता पर,
जब तक पूरा जल ना जाऊं
तब तलक तुम रुके रहना....

तुम मिल जाओ,
ज़िंदगी से यही गुज़ारिश थी,
तुम्हे पाने, तुम्हे छूने की,
एक अकेली ख्वाहिश थी,
अब तुम्हे छू कर,
खुश्बुओं मे जब तक बदल ना जाऊं,
तब तलक तुम रुके रहना,
मैं अपनी चिता पर,
जब तक पूरा जल ना जाऊं......

हाँ, तुम्हारी ही परस्तिश थी,
तुम्हारी ही इबादत थी,
तुमसे ही मेरा वुजूद था,
तुमसे ही दिल को राहत थी,
अब, जब तक  जी भर के,
तुम्हे देख न लूँ,
और हवा के साथ निकल ना जाऊं,
तब तलक तुम रुके रहना,
मैं अपनी चिता पर,
जब तक पूरा जल ना जाऊं.......

हाँ, तुमने आने मे देर तो की,
मगर आये हो,
ये कम है क्या,
अब चलते चलते,
तुम्हे देख लिया,
तो हम भूल गये,
दर्द है क्या,
और गम है क्या,
अब, तेरी मुहब्बत को लिये हुए,
जब तक फ़िज़ा मे घुल ना जाऊं,
तब तलक तुम रुके रहना,
मैं अपनी चिता पर,
जब तक पूरा जल ना जाऊं......

- अरमान

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